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देश में पहली बार हींग की खेती लाहौल स्पीति से शुरू कृषि मंत्री ने किया शुभारंभ

Edited By: हिमाचल एक्सप्रेस डेस्क
अपडेटेड: one year ago IST

हींग हमारे भारत देश में मसालों में एहम स्थान रखता है जिसका स्वाद यंहा के हर व्यंजन में मिलता है। भारत दुनियां के कुल हींग उतत्पादन का 40 प्रतिशत अपने घरेलू उपयोग में लाता है जिसे ईरान ,तुर्किस्तान व अफगानिस्तान के अलावा कजाकिस्तान से मंगवाया जाता है। हींग का पौधा शुष्क ठंडी मरु भूमि में पैदा होता है जो मुख्यतः ईरान, तुर्की ,कजाकिस्तान, रूस, सीरिया व अफगानिस्तान के ठंडे क्षेत्रों में उगता है। भारत हींग के लिए पूरी तरह से इन्ही देशों पर निर्भर है तथा इसे आयात करने के लिए कई हज़ार करोड़ रुपए खर्च करता है। हींग का प्रथम बीज़ भारत में मंगवाने वाले वाणिज्यिक फसलों पर पिछले 17 वर्षों से शोध में लगे डॉ विक्रम शर्मा ने बताया कि हींग के लिए हमारे देश में पर्वतीय क्षेत्रों में हिमालयी क्षेत्र अति उपयुक्त हैं जिनकी जलवायु हींग उत्त्पादन के लिए बहुत उपयुक्त है। डॉ विक्रम शर्मा हिमाचल प्रदेश में कॉफ़ी पौधों के सफल परीक्षण तथा प्रसार के लिए भी जाने जाते हैं तथा मौजूदा समय में केंद्रीय कॉफ़ी बोर्ड ,वाणिज्य एवं उधोग मन्त्रालय भारत सरकार के निदेशक भी हैं। डॉ शर्मा ने बताया कि उन्होंने पिछले वर्ष बहुत मुश्किल से हींग का बीज़ ईरान से हासिल किया था, इसके बाद तुर्की, व अफगानिस्तान से भी उन्होंने बीज़ हासिल कर लिया है तथा उसे प्रयोगिक तौर पर लगाने के लिए भारत सरकार व प्रदेश सरकारों से आग्रह कर रहे थे ताकि इसे उचित समय पर उचित स्थान पर लगाया जा सके। डॉ विक्रम ने बताया कि केंद्र सरकार की गरीब किसान व बागवान की आय दोगुनी करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रम के तहत उन्होंने वाणिज्यिक फसलों के नए नए शोध व प्रसार की कोशिश में लगे हुए हैं ताकि पहाड़ी क्षेत्रों में वाणिज्यिक फसलें उगा कर आर्थिक स्थिति को मजबूत करते हुए पलायन को रोका जा सके। डॉ विक्रम ने हींग के उत्तपादन पर बात करते हुए कहा कि पिछले दिनों उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर जी ने बुलाया था तथा इस कार्यक्रम को पूरा सहयोग देने की बात कही थी, जिसके चलते कृषि व जनजातीय विकास मंत्री डॉ राम लाल मारकण्डा ने लाहौल स्पीति में हींग का प्रथम परीक्षण करने में पूरा सहयोग किया। डॉ शर्मा ने बताया कि प्रयोगिक तौर पर हींग के बीज़ स्थानीय लोगों व कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कृषि विज्ञान केंद्र उदयपुर जिला लाहौल स्पीति में दिए गए, जिन्हें पौध तैयार होने पर बिभिन्न स्थानों पर लगाया जा सकेगा। हींग के लिए अन्य जगहों पर पूछने पर डॉ शर्मा ने बताया कि उन्होंने मंडी क्षेत्र के जंजैहली तथा ऊपरी पहाड़ी क्षेत्र, चम्बा जिला के तीसा, किन्नौर के ऊपरी क्षेत्र को भी चुना हुआ है जिस पर जल्द ही प्रयोगिक तौर पर कार्य किया जाएगा। डॉ विक्रम ने हींग के लिए उत्तराखंड के ऊपरी शुष्क ठंडे क्षेत्र, अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी भाग को भी हींग के लिए उपयुक्त बताया। डॉ विक्रम ने कहा कि जब उन्होंने कृषि मंत्री डॉ राम लाल मारकण्डा के साथ दौरा किया तो कुछेक क्षेत्रों में हींग की मिलती जुलती किस्मों को भी चिह्नहित किया, जिससे इस क्षेत्र में हींग के वाणिज्यिक उत्तपादन की सम्भावबनाएँ और भी प्रबल हो जाती हैं। डॉ शर्मा ने अन्य अन्तराष्ट्रीय वाणिज्यिक फसलों पर बात करते हुए कहा कि प्रदेश में आर्थिक स्वावलम्बन की अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें मात्र कृषि बागवानी द्वारा ही पूरा किया जा सकता है जो एक प्रदूषण मुक्त उधोग है तथा हमारे शांतिप्रिय प्रदेश के लिए बहुत अनुकूल है। डॉ विक्रम ने बताया कि उन्होंने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को भी हींग की खेती की संभावनाओं से अवगत करवाया है ताकि देश की हींग पूर्ति को देश में ही पूरा किया जा सके तथा करोड़ों रुपए की विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। डॉ शर्मा ने बताया कि हींग गाजर प्रजाति का एक छोटा सा पौधा है जिसका आयु समय पांच वर्ष है, एक पौधा करीब आधा लीटर से एक लीटर तक हींग का दूध पैदा कर देता है जिसका बाजार में मूल्य 12 हज़ार से 35 हज़ार तक है। उन्होंने बताया कि बाजार में मिलने वाला हींग अशुद्धियों से भरपूर होता है जिसमे आटा व अन्य अशुद्धियां डाल कर बनाया जाता है। इसमें 80% से 95 प्रतिशत तक आटा मिला कर बाजार में बेचा जाता है। डॉ शर्मा ने बताया कि अभी तक हींग का देश में कभी भी किसी शोध संस्थान ने कोई ट्रायल नहीं किया न ही बीज़ उपलव्ध हो पाया, पिछले दिनों इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन बायोटेक्नोलॉजी पालमपुर ने भी उनसे परीक्षण के लिए बीज़ मांगा था जो उन्होंने करीब 200 ग्राम डायरेक्टर डॉ संजय कुमार व उनकी टीम को सौंप दिया था। डॉ विक्रम ने कहा कि अगर हिमालयी प्रदेश सरकारें उनका सहयोग करें तो अन्तराष्ट्रीय वाणिज्यिक फसलों पर शोध व प्रसार से देश व प्रदेशों में युवाओं के लिए आर्थिक स्वावलम्बन की राह आसान की जा सकती है तथा बंजर होती जमीन , कृषि छोड़ता किसान, व पलायन करता युवा को पुनः स्थापित किया जा सकता है।

 

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