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51 शक्तिपीठों में से एक हैं ज्वालामुखी मंदिर,बिना घी-तेल से जलती है अखंड ज्योतियाँ

Edited By: हिमाचल एक्सप्रेस डेस्क
अपडेटेड: 2 months ago IST

विश्वप्रसिद्ध शक्तिपीठ श्री ज्वालामुखी मंदिर:

ज्वालामुखी शक्तिपीठ विश्व में पहला ऐसा मंदिर है, जहां प्रतिमा की पूजा नहीं होती। मंदिर में सात ज्योतियां अनादिकाल से विराजमान हैं। मंदिर में श्रद्धालु इन ज्योतियों की ही पूजा करते हैं। हिमाचल प्रदेश के इस सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ में मां चमत्कारी ज्योतियों के रुप में भक्तों को साक्षात दर्शन देती हैं मां ज्वाला देवी मुख्य मंदिर के गर्भ गृह में 7 अखंड ज्योतियों विराजमान है जिन्हे अलग - अलग नामों से पुकारा जाता है। ज्योतियों में सर्वप्रथम मां ज्वाला महाकाली के रुप में प्रकट हैं। चंडी, हिंगलाज, विध्यवासिनी, अन्नपूर्णा, महालक्ष्मी, महासरस्वती के रुप में मंदिर में यह ज्योतियां साक्षात भक्तों को दर्शन देती है। 51 शक्तिपीठों में मां ज्वाला को सर्वोपरि माना गया है।

मां ज्वाला का इतिहास

कांगड़ा घाटी में स्थित श्री ज्वालामुखी शक्तिपीठ की मान्यता 51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि मानी गई है। इन पीठों में यही एक ऐसा शक्तिपीठ है जहां मां के दर्शन साक्षात ज्योतियों के रुप में होतें हैं।

शिव महापुराण में भी इस शक्तिपीठ का वर्णन आता है। जब भगवान शिव माता सती को पूरे ब्रहांड़ के घूमने लगे तब सती की जिव्हा इस स्थान पर गिरी थी जिससे यहां ज्वाला ज्योति रुप में यहां दर्शन देती हैं।

एक अन्य दंत कथा के अनुसार जब माता ज्वाला प्रकट हुई तब एक ग्वालो को सबसे पहले पहाडी पर ज्योति के दिव्य दर्शन हुए। राजा भूमिचन्द्र ने मंदिर के भवन को बनवाया ।

यह भी धारणा है कि पांडव ज्वालामुखी में आए थे कांगड़ा का एक प्रचलित भजन भी इस का गवाह बनता है..पंजा पंजा पांडवां मैया तेरा भवन बनाया, अर्जुन चंवर झुलाया मेरी माता...

अकबर भी हुआ था मां ज्वाला का मुरीद

राजा अकबर भी मां ज्वाला की परिक्षा लेने के लिए मां के दरबार में पंहुचा था। उसने ज्योतियों के बुझाने के लिए अकबर नहर का निर्माण करवाया लेकिन मां के चमत्कार से ज्योतियां नही बुझ पाई। तब राजा अकबर एक अन्य प्रचलित भेंट के अनुसार नंगे नंगे पैरी माता अकबर आया, सोने दा छत्र चढ़ाया मेरी माता प्रचलित है। राजा अकबर को अंहकार हुआ था कि उसने सवा मन सोने का छत्र हिंदू मंदिर में चढ़ाया था मां ज्वाला ने इस छत्र को अस्वीकार कर खंडित कर दिया था। आज भी दर्शनार्थ अकबर का छत्र मंदिर में मौजूद है।

ज्वालाजी मंदिर मंडप शैली निर्मित है

मां ज्वालादेवी का मंदिर मंडप शैली का है मुख्य मंदिर के बाहरी छत्र पर सोने का पालिश चढ़ाया गया है। इसे महाराजा रणजीत सिंह ने अपने शासनकाल में चढवाया था। उनके पौत्र कुंवर नौनिहाल सिंह ने मंदिर के मुख्य दरवाजों पर चांदी के पतरे चढवाऐ थे जो कि आज भी दर्शनीय हैं।

कैसे पहुंचे ज्वालामुखी 

यहां पहुंचना बेहद आसान है। यह जगह वायु मार्ग, सड़क मार्ग और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ी  हुई है।

वायु मार्ग:

ज्वालाजी मंदिर जाने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा गगल में है, जो कि ज्वालाजी से 46 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां से मंदिर तक जाने के लिए कार व बस सुविधा उपलब्ध है।

रेल मार्ग:

रेल मार्ग से जाने वाले यात्री पठानकोट से चलने वाली स्पेशल ट्रेन की सहायता से मरांदा होते हुए पालमपुर आ सकते है। पालमपुर से मंदिर तक जाने के लिए बस व कार सुविधा उपलब्ध है।

सड़क मार्ग:

पठानकोट, दिल्ली, शिमला आदि प्रमुख शहरों से ज्वालामुखी मंदिर तक जाने के लिए बस व कार सुविधा उपलब्ध है। यात्री अपने निजी वाहनों व हिमाचल प्रदेश टूरिज्म विभाग की बस के द्वारा भी वहां तक पहुंच सकते हैं। दिल्ली से ज्वालाजी के लिए दिल्ली परिवहन निगम की सीधी बस सुविधा भी उपलब्ध है।

 

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